Saturday, 17 September 2016

स्वच्छ भारत अभियान बनाम हमारा चुनावी आचरण पिछले दिनों सम्पन्न हुआ दिल्ली विश्ववविद्याल छात्रसंघ (डूसू) चुनाव हमारे मन मष्तिष्क पर कुछ यक्ष प्रश्न छोड़ गया कि क्या शिक्षा के इन मंदिरों में हम देश का बौद्धिक वर्ग तैयार कर रहे हैं क्या वो स्वयंभू विकसित भविष्य उसके अनुसार आचरण भी कर रहा है या नहीं ????? दिल्ली हमारे देश की राजधानी है । जैसे यह विश्व के सर्वश्रेष्ठ नगरों में कहीं कोई स्थान नहीं बना पायी इसीप्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय देश के चुनिन्दा सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में है किन्तु यह भी विश्व के सर्वश्रेष्ट विश्वविद्यालयों के आगे कहीं नहीं ठहराता ।क्यों ? क्यों कि किसी स्थान या संस्थान को सर्वोत्तम वहां की व्यवस्था तथा मानवीय आचरण ही बनाता है । मैं यह प्रश्न इसलिए उठा रहा हूँ क्यों कि पिछले दिनों सम्पन्न हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव यही दर्शा गया कि देश का सर्वोत्तम शिक्षित बौद्धिक युवा जिस शिक्षा,संस्कार तथा देश के उत्थान में भूमिका निभाने को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय आता है उसका आचरण व व्यवस्था का प्रवंधन ही शहर व संस्थान का भविष्य तथा विश्व में स्थान तय करता है । मैंने देखा कि विश्वविद्यालय के छात्र जो अधिकाशतः दिल्ली मेट्रो का उपयोग आवागमन के सुलभ साधन के रूप में करते हैं । जब वे मेट्रो में दिखाई देते हैं तव उनका आचरण ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र न होकर प्रतिष्ठित आक्सफोर्ड, स्टेनफोर्ड, कैम्ब्रिज इत्यादि विश्वविद्यालयों के छात्र हों और वे मानव संस्कारों के विकसित स्वरूप हों किन्तु मेट्रो स्टेशन से बाहर आते ही उनका चुनावी वातावरण में शामिल होते ही उनके आचरण में स्वछंदता, उन्माद, लापरवाह व असभ्य कार्य संस्कृति प्रदर्शन करते दिखते हैं उनका यह आचरण देश की प्रतिष्ठा और उसको सर्वश्रेष्ट बनाने के स्तर को और दूर ले जाने वाले प्रतीत होते हैं । चुनाव प्रचार के दौरान हर तरह का कूडा करकट, अनियोजित तरीके से खाने पीने का सामान, पोस्टर ,कार्ड्स तथा अन्य चुनावी सामग्री स्टेशन परिसर व उसके बाहर चारों तरफ फैलाया गया उनके इस कृत्य ने देश को विश्व के सामने शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यही इस विश्ववविद्यालय के छात्रों का आचरण है । क्या यही छात्र विश्व में भारत की स्वच्छता व सभ्यता के दूत बनेगें ? यह तो भला हो कुछ कर्तव्यनिष्ठ,सभ्य, सुशील तथा संवेदनशील छात्रों का जिन्होंने एक स्वंयसेवक के रूप में बिखरे हुए कचरे को सैकड़ों बैगों में सलीके भरकर निस्तारित कर दिया ऐसे स्वंयसेवक छात्रों के बीच जब कुछ विदेशी अतिथि छात्र भी सम्मिलित हो जायें तव यह स्थिति भारत की प्रतिष्ठा को और भी शर्मसार करने वाली हो जाती है किन्तु ऐसे छात्र स्वंयसेवकों पर भारत को गर्व है उन्हें हमारा कोटि-कोटि अभिनन्दन । मैं इस विषय को इसलिए उठा रहा हूँ कि जब देश का प्रधानमंत्री के साथ-साथ वहां का मुख्य मंत्री भी हमें स्वच्छता अभियान के माध्यम से हमें जागरुकता के साथ-साथ कर्तव्यों का बोध कराते हैं ।इस अभियान को एक आंदोलन में परिवर्तित करते हैं तब फिर हम सभी का यह दायित्व बनता है कि जिस प्रकार हम अपने घरों में स्वच्छ वातावरण पंसंद करते हैं उसी प्रकार हम देश में भी स्वच्छता लाने मे अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करें तथा यह निवेदन व आशा करता हूँ कि छात्र संघ चाहे सत्ताधारी दलों के हों या विपक्षी दलों के कठोर से कठोर दिशानिर्देश जारी कर उनका अनुपालन सुनिश्चित करें ताकि दिल्ली विश्वविद्धयालय भी उन प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में सम्मिलित हो सके और जिस आचरण का हम दिल्ली मेट्रो में सहयोग करते हैं वहीं सम्पूर्ण राष्ट्र में करें जिससे कि देश को और अधिक शर्मसार स्वच्छ भारत अभियान बनाम हमारा चुनावी आचरण पिछले दिनों सम्पन्न हुआ दिल्ली विश्ववविद्याल छात्रसंघ (डूसू) चुनाव हमारे मन मष्तिष्क पर कुछ यक्ष प्रश्न छोड़ गया कि क्या शिक्षा के इन मंदिरों में हम देश का बौद्धिक वर्ग तैयार कर रहे हैं क्या वो स्वयंभू विकसित भविष्य उसके अनुसार आचरण भी कर रहा है या नहीं ????? दिल्ली हमारे देश की राजधानी है । जैसे यह विश्व के सर्वश्रेष्ठ नगरों में कहीं कोई स्थान नहीं बना पायी इसीप्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय देश के चुनिन्दा सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में है किन्तु यह भी विश्व के सर्वश्रेष्ट विश्वविद्यालयों के आगे कहीं नहीं ठहराता ।क्यों ? क्यों कि किसी स्थान या संस्थान को सर्वोत्तम वहां की व्यवस्था तथा मानवीय आचरण ही बनाता है । मैं यह प्रश्न इसलिए उठा रहा हूँ क्यों कि पिछले दिनों सम्पन्न हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव यही दर्शा गया कि देश का सर्वोत्तम शिक्षित बौद्धिक युवा जिस शिक्षा,संस्कार तथा देश के उत्थान में भूमिका निभाने को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय आता है उसका आचरण व व्यवस्था का प्रवंधन ही शहर व संस्थान का भविष्य तथा विश्व में स्थान तय करता है । मैंने देखा कि विश्वविद्यालय के छात्र जो अधिकाशतः दिल्ली मेट्रो का उपयोग आवागमन के सुलभ साधन के रूप में करते हैं । जब वे मेट्रो में दिखाई देते हैं तव उनका आचरण ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र न होकर प्रतिष्ठित आक्सफोर्ड, स्टेनफोर्ड, कैम्ब्रिज इत्यादि विश्वविद्यालयों के छात्र हों और वे मानव संस्कारों के विकसित स्वरूप हों किन्तु मेट्रो स्टेशन से बाहर आते ही उनका चुनावी वातावरण में शामिल होते ही उनके आचरण में स्वछंदता, उन्माद, लापरवाह व असभ्य कार्य संस्कृति प्रदर्शन करते दिखते हैं उनका यह आचरण देश की प्रतिष्ठा और उसको सर्वश्रेष्ट बनाने के स्तर को और दूर ले जाने वाले प्रतीत होते हैं । चुनाव प्रचार के दौरान हर तरह का कूडा करकट, अनियोजित तरीके से खाने पीने का सामान, पोस्टर ,कार्ड्स तथा अन्य चुनावी सामग्री स्टेशन परिसर व उसके बाहर चारों तरफ फैलाया गया उनके इस कृत्य ने देश को विश्व के सामने शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यही इस विश्ववविद्यालय के छात्रों का आचरण है । क्या यही छात्र विश्व में भारत की स्वच्छता व सभ्यता के दूत बनेगें ? यह तो भला हो कुछ कर्तव्यनिष्ठ,सभ्य, सुशील तथा संवेदनशील छात्रों का जिन्होंने एक स्वंयसेवक के रूप में बिखरे हुए कचरे को सैकड़ों बैगों में सलीके भरकर निस्तारित कर दिया ऐसे स्वंयसेवक छात्रों के बीच जब कुछ विदेशी अतिथि छात्र भी सम्मिलित हो जायें तव यह स्थिति भारत की प्रतिष्ठा को और भी शर्मसार करने वाली हो जाती है किन्तु ऐसे छात्र स्वंयसेवकों पर भारत को गर्व है उन्हें हमारा कोटि-कोटि अभिनन्दन । मैं इस विषय को इसलिए उठा रहा हूँ कि जब देश का प्रधानमंत्री के साथ-साथ वहां का मुख्य मंत्री भी हमें स्वच्छता अभियान के माध्यम से हमें जागरुकता के साथ-साथ कर्तव्यों का बोध कराते हैं ।इस अभियान को एक आंदोलन में परिवर्तित करते हैं तब फिर हम सभी का यह दायित्व बनता है कि जिस प्रकार हम अपने घरों में स्वच्छ वातावरण पंसंद करते हैं उसी प्रकार हम देश में भी स्वच्छता लाने मे अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करें तथा यह निवेदन व आशा करता हूँ कि छात्र संघ चाहे सत्ताधारी दलों के हों या विपक्षी दलों के कठोर से कठोर दिशानिर्देश जारी कर उनका अनुपालन सुनिश्चित करें ताकि दिल्ली विश्वविद्धयालय भी उन प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में सम्मिलित हो सके और जिस आचरण का हम दिल्ली मेट्रो में सहयोग करते हैं वहीं सम्पूर्ण राष्ट्र में करें जिससे कि देश को और अधिक शर्मसार होने से बचाया जा सके । होने से बचाया जा सके ।


Thursday, 15 September 2016

चिकनगुनिया : - एक चुनोती

14 सितम्बर 2016 को नवभारत टाइम्स ने चिकनगुनिया जैसी  महामारी पर खास रिपोर्ट पेश की।अपनी इस रिपोर्ट में  उन्होंने बताया की अबतक 10  से ज़्यादा लोगों की मौत चीकन गुनिया से हो चुकी है।और ऐसे मे  लोगों तक स्वास्थ्य संबंधी  सुविधा पहुँचाने  की बजाय राजनीतिकसियासत तेज़ हो रही है।आम आदमी पार्टी पर उठने वाले सवालों पर अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि " सी.एम् और मिनिस्टर के पास अब एक पेन तक खरीदने की पावर नही बची है , पी.एम् और एल.जी के पास दिल्ली से जुड़े  सारे अधिकार  और शक्तियां है।"  वही दूसरी और सरकार  के मंत्रियौ ने आरोप लगाया कि  "अब तक  एम् सी डी  ने किसी भी इलाके में  दवाई नहीं डाली  है और बिमारियों  की रोकथाम की ज़िम्मेदारी  निभाने में  एम् सी डी  पूरी तरह से नाकाम है। वही हेल्थ मिनिस्टर सत्येंदर  जैन  का कहना था कि " चिकनगुनिया  से  पैनिक न फैलायें क्योंकि इस बिमारी  से मौत नही होती , रोकथाम की पूरी ज़िम्मेदारी एम् सी डी  की है। वह महामारी फ़ैलाना चाहती है इसलिये सफाई नही कर रही।  सरकारी  हस्पताल मरीजों से भरे पड़े है।  परंतु न उनके लिये बेड  है और न ही चिकित्सा की व्यवस्था।  कर्मचारियों  की भी अत्याधिक कमी हो रही है। 
ऐसे में  केन्द्र और दिल्ली सरकार को आपस में  उलझने की बजाय इस कार्य को देखना  द चाहिय कि  इस महामारी को रोका  कैसे जाय।  सारी  एजैंसियों को मिलकर काम करना चाहिय।    इसके लिये सामाजिक संगठन और युवा संगठनो  को भी सामने आना चाहिय।ऐसी  पहल इस . जी  . टी  .भी खालसा कॉलेज की एन  .एस . एस टीम करने जा रही है।  कॉलेज के छात्र आने वाले दिनों में दिल्ली के लोक नायक हस्पताल मे  मरीजों की सहायता  के लिये नियुक्त किया जायेंगे।  वस्तुत ऐसी पहल बाकी संगठनों को भी करनी चाहिय तभी इस बिमारी   को रोका  जा सकता है। अतः  यह सही समय है  ज़िम्मेदारी लेने और निभाने का। 

Monday, 12 September 2016

एक अनदेखी समस्या

आज जब मैं एस. जी. टी .बी  खालसा कॉलेज से वेब जर्नलिज्म की कक्षा लेकेर मेट्रो द्वारा  अपने घर  जा रही थी तब  मैने कश्मीरी  गेट पर मेट्रो  में बहुत ज़्यादा भीड़ का सामना किया।  स्त्री  और पुरुष दोनों ही सामान मात्रा में  नज़र आ रहे थे।  ऐसे मे महिलाओं का कोच पूरी तरह से भर गया था और मजबूरी में  मुझे समान वर्ग वाले कोच मे  आना पड़ा।  तभी मैंने देखा  कि  एक महिला और पुरुष आपस मैं लड़ पड़े , इसीलिए क्योंकि महिला को ऐसा अनुभव हुआ कि  उसके साथ बैठा व्यक्ति उसे छेड़  रहा है। आपसी बहस मे  मेरे कानों मे  एक वाक्य  पड़ा , उस पुरुष का कहना था कि " इतनी दिक्कत है तो महिलाओं के कोच मे  जाओ। " अब भला मेट्रो के आठ कोच मे  से सिर्फ एक कोच महिलाओं के लिये आरक्षित है तो कितनी महिलाएं उसमे आ पाएंगी ? और आज के दौर मे  जहाँ पुरुषों के समान ही  स्रियाँ भी काम करने के लिये जाती है और सरकारी परिवाहनों  का इस्तेमाल करती है , सिर्फ एक महिला कोच आरक्षित करने से  ऐसी समस्या का हल नही  सकता। स्त्री और पुरुष आज के युग मे  दोनों ही सामान है और दोनों को ही समान हक़ मिलना चाहिये  । मेरी राय मे  मेट्रो का जो एक कोच महिलाओं के लिये आरक्षित है उससे बढ़ा  कर कम से काम ३ कर देना चाहिय तभी कुछ हद्द तक इस समस्या का निवारण हो पाएगा और महिलाओं को ऐसे अभद्र टिप्पणियों  का सामना नही करना पड़ेगा ।  एक अनदेखी  समस्या 

Thursday, 8 September 2016

Sanchar

एस.जी. टी. बी.खालसा कॉलेज में आदरणीय डॉ स्मिता मिश्रा के सानिध्य में आरम्भ हुए पाठ्यक्रमों वेब पत्र्कारिता एवम स्पोर्ट इकनोमिक एंड मार्केटिंग के छात्रों की संयुक्त कक्षाओं को संबोदित करते हुए कल के गेस्ट लेक्चरर सनी गोंडजी ने संचार पर अपनी विशेसज्ञता तथा इन दोनों पाठ्यक्रमों के अन्तर्गत आने वाले क्षेत्रों में संचार तथा संचार के  माध्यमोँ की उपयोगिता के बारे में अवगत कराया

        सनी गोंडजी ने छात्रों को संचार शब्द के बारे में बताया कि "दो व्यक्तियों या समूहों के मध्य कुछ सार्थक चिन्हों,संकेतों,प्रतीकों,तथा कौशल के द्वारा सूचना ,जानकारी,ज्ञान,या मनोभावों का आदान-प्रदान संचार है। 
                                   अर्थात 
         संचारक (sender) और प्रापक (receiver)के मध्य वह उभयनिष्ठता स्थापित करता है। 

 प्राचीन काल  से आज के आधुनिक युग तक संचार के द्वारा ही मानव सभ्यता में सतत रूप से विशाल परिवर्तन हुआ है।
         संचार की उपयोगिता व उसके तकनीकी पहलुओं पर व्यापक रूप से प्रकाश डालते हुए सनीजी ने बताया कि संचार ही मानव संबंधों के विकास की धुरी है जो आदि मानव युग से आज के युग तक बिभिन्न माध्यमों के रूप में अनवरत प्रगतिशील है। जहाँ आज से कुछ दशक पूर्व संचार के सीमित साधन पत्र व्यवहार,तार,शार्ट हैण्ड लिपि,रेडियो,टेलीफोन तथा दूरदर्शन टेलीविज़न हुआ करते थे वहीँ आज के डिजिटल समय में कई आधुनिक सुबिधाओं जैसे-इन्टरनेट,मोबाइल फोन,स्मार्ट फ़ोन,सैटेलाइट चैनल,ई-पेपर,तथा सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों से पत्रकारिता व मार्केटिंग के अलावा समूची मानव सभ्यता में गुणात्मक रूप से व्यापक परिवर्तन कर दिया है। जिसका परिणाम मानव जीवन में समय की कमी के रूप में आ रहा है। आज संचार माध्यमों ने समाज, राज्य,तथा राष्ट्रों की सीमाओं से परे जाकर समूचे विश्व को अप्रत्यक्ष तौर पर एकीकृत कर दिया है।



संचार का पाठ

एक भूत  अपनी प्रवृति अनुसार लोगों को संकट में लाने के लिए एक आसान सवाल पूछता।
भूत  : ठंड कब होती है?
पहला आदमी  : दिसम्बर - जनवरी में ।
भूत ने उसे मार दिया।
कुछ दिन बाद दूसरा आदमी मिला । भूत ने उससे भी वही प्रश्न दोहराया। उसने भी वही जवाब दिया कि ठंड दिसम्बर - जनवरी में होती है । भूत ने उसे भी मार दिया ।कुछ महिनों तक यही  प्रश्न, यही उत्तर और यही सज़ा किंतु हर बार नए व्यक्ति पर दोहराये गए ।
पर कहानी का अंत तो होता ही है।भूत को भी आखिर वो इंसान मिला जिसने सही जवाब (जो भूत को समझ में आया ) दिया।उसने कहा कि ठंड जब पड़ती है जब ठंडी हवा चलती है ।और भूत ने उसे जाने दिया।
अब विचार किया जाए कि दिसम्बर -जनवरी वाले जवाब में क्या गलती थी ? उत्तर तो वो भी सही था।
किंतु...... भूत..  को वो उत्तर सही नहीं  लगता ।क्योंकि उसे  वो समझ में ही नहीं आता । ऐसा इसलिए क्योंकि उसकी मौत मई के महिने में ठंड से हुई थी ।इस कारण ही वो मानता था कि ठंड सिर्फ दिसम्बर-जनवरी में ही नहीं होती बल्कि मई में भी होती है ।इसी का उत्तर वो जानना चाहता था ।जो उसे उस आदमी के उत्तर में मिला ।
इस कहानी से पता चलता है कि एक संचारक (sender) को  प्रापक (reciever) के ,यहाँ पर भूत ,के विश्वास और उसके मनोविज्ञान के अनुकूल ही अपना  संदेश  देना चाहिए।तभी हमारा संचार पूरी तरह सफल होगा।
यही और ऐसी  ही कुछ बातें अपनी संचार की कक्षा में मैंने समझी।यह कक्षा हमारे अध्यापक Mr. Sunny ने दी ।उन्होंने समझाया कि क्यों संचार करना हमारी ज़रूरत है और जब हम हमारी बात-चीत बंद होती है तो क्या परिणाम हो सकता है ।उन्होंने बताया कि संचार से ही मेल जोल बढ़ता है ।अपनी बात दूसरों तक पहुँचाने के कारण ही आज मनुष्य एक समाज में खुद को बुन पाया है ।उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी जी के उदाहरण से हमें बताया कि कैसे संचार को अधिक सफल बनाया जा सकता है ।उन्होंने समझाया कि मोदी जी कैसे अपने संदेश की भाषा को प्रापक  (reciever ) के अनुकूल बनाते हैं ।जब वो अमेरिका में भाषण देते हैं तो आधुनिकरण की बातें करते हैं ।वहीं जब भोले-भाले ग्रामीण जन मानस को सम्बोधित करते हैँ  तो कैसे उन की बोली में बोलकर उनके दिलों तक पहुँचते हैं । अपने प्रापक को समझना भी ज़रूरी है ।एक अच्छा संचारक वही है जो अपना संदेश सामने वाले को समझा सके ।किंतु कई बार संचार में अवरोध होते हैं - भौतिक कारण (शोर), भाषा संबंधी, मनोवैज्ञानिक( विश्वास) आदि।

सफल संचार के लिए न सिर्फ शाब्दिक अपितु अशाब्दिक संचार का भी महत्त्व है ।कई विद्वान तो सफल संचार का श्रेय 50 % तक अशाब्दिक संचार को ही देते हैं ।संचार प्रक्रिया में शामिल लोगों की संख्या के आधार पर  संचार मुख्यतः चार प्रकार का है - अंतः वैयक्तिक संचार (स्वयं से संचार ),अंतर वैयक्तिक संचार( दो लोगों के बीच संचार ),समूह संचार (समूह में या समूह से संचार ) और जन संचार (जनसमूह से संचार)।
अब हम जन समूह संचार (mass communications) को पढ़ेंगे । यह आज के प्रजातंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है ।इससे हम अपनी बात बड़े जनसमूह तक पहुँचा पाते हैं।किंतु बड़े समूह के साथ सावधानियाँ भी अधिक होती हैं ।जैसे सही माध्यम ,भाषा अपने उद्देश्य , अपने प्रापक के हिसाब से चुनना आदि ।
तो मैं कह सकती हूँ कि मैंने सीधी -सरल बातों से जटिल चीजों को सीखा ।कक्षा को जिंदगी में जोड़ना सीखा ।



Wednesday, 7 September 2016

Communication

Our teacher mr. Sunny kumar gond is teaching us about communication.
Comunnication is a latin word. It mean common.
Process of communication is
1.sender
2.message
3.reciever

Barriers of communication is
1.physical barriers
2.language barriers
3.pshycology barrier
Types of communication is
1.intrapersonal communication
2.interpersonal communication
3.group communication
4.mass communication

sanchar - ek abhin ang

 क्या होता  अगर  आज हमारे  पास संचार  के माध्यम ना  होते  तो ? ऐसा  सोचना अत्यंत कठिन है  क्योंकि संचार  के बिना मानव  जीवन  की  कल्पना  नही की  जा सकती । यह हर व्यक्ति और समाज का अभिन्न अंग है,ऐसा अंग जिसके द्वारा हम अपने विचार दूसरों तक पहुँचाने मे सक्षम हो पाय है । आज विज्ञानं ने हमारी  इतनी साहित्य की है कि  हम संसार के किसी भी कोने तक घर बैठे अपनी बात पहुँचा  सकते है । संचार के माध्यम से आज हर व्यक्ति  हर समाज हर क्षत्रे  हर कार्यालय जुड़ पाया है । जब भी हम कभी गांव  जाते है तो हम देखते है कि  लोग आपस मे  जुड़े हुए है ऐसा इसलिये क्योंकि उनके बीच विचारों व् भावों का आदान  प्रदान अधिक है  वह सब एक दूसरों के भावों को समझते है । उसी के विपरीत जब  हम किसी से लड़ाई करते है तो सबसे पहले हम बात करना बंद कर देते है और  इसी वजह  से दूरियां बढ़ने   लगती है। अतः  कहा  जा सकता है कि जितना  ज़्यादा संचार  होगा  उतना ही लोग आपस मै  जुड़ पाएंगे। सामाजिक दुनिया मे  आम आदमी आज अख़बार टेलीविसिओं रेडियो द्वारा दुनिया के संपर्क मे  आ पाया है ।  वह इतना जागरूक हो गया है की उससे सही और  गलत की पेह्चाह्न हो गई  है । .यही नही खुद  के विचार  को प्रस्तूत करने  मे   भी सक्षम हो गया है ।  आज की वेब जर्नलिज्म   की कक्षा मे  हमें यही सिखाएगा गया की वास्तविक रूप मे संचार है क्या और इसका विकास कैसे हुआ । प्राचीन समय मे  भी विचारों का आदान प्रदान  हुआ-  प्रारम्भ मे  ससंकेतों  दद्वारा  , फिर  चित्रों द्वारा और धीरे धेरे हम इस स्तिथि पर पहुँच पाय की आज  विचारों का आदान  प्रदान  कर पाय है । 

Saturday, 18 June 2016

Exciting careers in the heart of a newsroom:

Exciting careers in the heart of a newsroom:
The Statesman Ltd. has vacancies for young as well as experienced #journalists in its newsroom in Delhi. If you are interested and fit the bill, apply with your resume within 7 days.
Chief Sub-Editors: Must have experience of at least five years in an English newspaper or magazine. Candidates must have exceptional language skills and suitable academic qualifications. Knowledge of newsroom software including Quark Express is necessary.
Sub-Editors: Must have experience of at least two years in an English newspaper or magazine. Candidates must have exceptional language skills and suitable academic qualifications. Knowledge of newsroom software including Quark Express is necessary. Ideally the candidates should be below 30 years.
Reporters: Must have experience of at least two years in an English newspaper or magazine. Candidates must have good language skills, a nose for news and suitable academic qualifications. Ideally the candidates should be below 30 years.
Trainee Sub-Editors/ Reporters : Must have exceptional language and computer skills, a willingness to learn and an ability to think on his/her own feet. Shortlisted candidates will have to undergo a test. Freshers may apply.
Apply to The Editor, The Statesman by e-mail at hr@thestatesman.com
Please mention the position you are applying for in the subject line of your mail.

Wednesday, 23 March 2016